Chiraan Uvach
A Sermon on Indian Tradition

अर्थसंपत प्रक्रुतिसम्पदम करोती|

हम जब सम्म्रुद्ध हो जाते है और वो भी धर्म मार्ग से तब प्रकृति भी हमसे प्रसन्न रहती है| प्रकृति के प्रसाद से सभी प्रकार के
उपलब्धियाँ हस्तगत रहने से परिसर संपूर्णतया अनुकूल रहता है| राज्य मे सभी इस प्रकार से जीवन व्यतीत करने लगे तो बिना
राजा के भी राज्य सुव्यवस्थित रहता है| अधर्म से प्रकृति कुपित हो जाती है | यह कोप सभी कोपों से भी भयंकर होता है | इससे
अवश्य बचना चाहिए | प्रकृति कॉप से राज्य नष्ट हो जाता है| व्यक्तिगत रूप से देखा जाय तो अवनीति से कमाया हुआ धन को
प्रकृति छीन लेती है| धर्म से कमाया हुआ धन को प्रकृति सहायक बन जाती है| चिरकाल तक इस धन का उपभोग होता है|

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