Chiraan Uvach
A Sermon on Indian Tradition

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अर्थसंपत प्रक्रुतिसम्पदम करोती|

April 5, 2009

हम जब सम्म्रुद्ध हो जाते है और वो भी धर्म मार्ग से तब प्रकृति भी हमसे प्रसन्न रहती है| प्रकृति के प्रसाद से सभी प्रकार के
उपलब्धियाँ हस्तगत रहने से परिसर संपूर्णतया अनुकूल रहता है| राज्य मे सभी इस प्रकार से जीवन व्यतीत करने लगे तो बिना
राजा के भी राज्य सुव्यवस्थित रहता है| अधर्म [...]